पत्रकारों को कवरेज से न रोकें: प्रज्ञा मिश्रा मामले पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: पत्रकारों की स्वतंत्रता पर प्रहार बर्दाश्त नहीं
नई दिल्ली: भारत समाचार की पूर्व पत्रकार और 'उल्टा चश्मा' की संपादक प्रज्ञा मिश्रा की दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर से की गई जबरन गिरफ्तारी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पुलिस को किसी भी पेशेवर पत्रकार, वकील या अन्य पेशेवरों को उनके कर्तव्य निर्वहन से रोकने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को यह निर्देश दिए। अदालत की यह टिप्पणी पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है।
क्या था पूरा घटनाक्रम? जंतर-मंतर पर हुआ था विवाद
गौरतलब है कि महिला पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जंतर-मंतर पर आयोजित एक विरोध प्रदर्शन की लाइव कवरेज करने पहुँची थीं। इसी दौरान दिल्ली पुलिस ने उन्हें बलपूर्वक हिरासत में ले लिया और जबरन बस में ठूंस दिया। वायरल हो रहे वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि प्रज्ञा मिश्रा पुलिसकर्मियों से कह रही थीं कि 'मुझे छोड़ो, मैं खुद चल सकती हूँ, यह क्या तरीका है?' इसके बावजूद, महिला पुलिसकर्मियों ने उनके पैर पकड़कर जमीन से उठाया और बस में लाद दिया। पुलिस उन्हें बाद में कनॉट पैलेस थाने ले जाकर छोड़ी थी, जिसका यह शर्मनाक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया था।
प्रेस संगठनों में उबाल और न्यायिक हस्तक्षेप
इस बर्बर कार्रवाई के सामने आने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत चार अन्य प्रमुख मीडिया संगठनों ने इस घटना की कड़ी निंदा की थी। संगठनों ने खाकी की इस तानाशाही के खिलाफ उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग उठाई थी। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर इस सीधे हमले को लेकर देश भर के मीडिया जगत में भारी आक्रोश व्याप्त था। अब सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप के बाद, पत्रकारों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है कि क्या खाकी कानून के दायरे से बाहर जाकर पत्रकारों की आवाज दबाने का प्रयास कर रही है। 'ट्रेंड्स न्यूज' इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल जारी रखेगा।
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